काँव-काँव करै छी बौआ,
लोक बूझइए कौआ ।
सब केओ अहाँकें चिन्हि गेल अछि,
अनकर छी धनखौआ।।
महा मदारी मात्र मुदा छी,
नञि रहलहुँ शिवशंकर।
बहुत सूर्य छथि उदित अकाशे,
आब के बूझत दिनकर।।
भ्रम के त्यागू फेकू डमरू,
अपन बचाउ प्रतिष्ठा।
आबो शीघ्र सुधारू छवि के,
लोक बूझइए विष्ठा।।
छोरि प्रपंच ;पाप के त्यागू,
नञि रहलहुँ विश्वासित।
कहु कतेक दिन रहब सराहल,
दुष्टेसँ परिभाषित।।
दूष्टक दृष्टिकोण के त्यागु,
सीखू सज्जन के संस्कार।
शिष्ट आचरण चरण के राखू,
राखू उत्तम श्रेष्ट विचार।।.........
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